Monday 7 September 2015

एहसास

हम गरीबो को इतनी नसीब कहाँ
के लोग पूछे बिना ही हाज़िर हो जाये
बात ज़ुबान पे आके रुकी हो फिर भी
पूछे बिना हमे बताया कहाँ जाये!
थोड़ा दर्द दिखा मुझे इन गलियों में
जो रास्ता दूर से गुज़रती हुयी दिल तक पहुँचती है
दिख रहा है साफ़ आइनों की तरह
दिखाना चाहते हो खोल के या छुपाके इंतज़ार करें?
बोलते हम भी थे बहत एक ज़माने में
आँखों के आइना आज हमे बेज़ुबान बना दिया
बात कुछ भी हो, ग़म छुपाते है
दोस्त बैठा हो जब सुनने को तैयार, उसे ऐसे जाने देना ज़ुल्म कहलाते है
नाम न पुच्छू तो ही बेहतर है इन हालातो में
दीवारों की बेवफाई को नाम न दूँ किसी इंसान का
ज़िन्दगी देती कितनी सी है हम दीवानो को
लुटाते है हम उससे काफी ज़्यादा अफ़्सानो की चाहत में
ग़म छुपा के न जियो दोस्त मेरे
ग़म भुलाके न जियो
खुशबू-ए-दर्द सिनो को महकाते रहे
ग़म को जी भर के जियो


1 comment: